पौराणिक कथाओं में राहु के पिता का नाम विप्रचित्त और माता का नाम सिंहिका बताया गया है। दैत्य पुत्र अपनी माता के नाम से सौंहिकेय भी कहलाता था। इस दैत्य पुत्र की चार भुजाएं और एक पूंछ भी थी। समुद्र मंथन के बाद निकले अमृत की वजह और भगवान विष्णु की माया का प्रसंग आप सभी को मालूम ही होगा। अमृत पान के लिए राहु ने दैत्य से देवता का छद्म वेश धारण कर लिया और देवताओं की पंक्ति में जा बैठा। उसने कुछ अमृत भी लिया लेकिन सूर्य और चन्द्रमा ने उसका भेद उजागर कर दिया। विष्णु ने उसी वक्त उसके शरीर से मस्तक को सुदर्शन चक्र से अलग कर दिया और उसकी भुजाएं भी काट डाली। अमृत पान की वजह से वह मारा तो नहीं गया लेकिन उस समय से ही स्वर्भानु अमर हो गया और तारा मंडल में विशेष स्थान पा कर विश्व विख्यात हो गया। उसके शीश और धड़ दोनों ही जीवित माने जाते हैं। इसका सिर राहु कहलाया और धड़ को केतु के रूप में जाना जाता है।
नवग्रहों के रूप में राहु-केतु की स्थापना कैसे हुई?
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से राहु का मस्तक काटा तो राहु का सिर वहीं रह गया और उसका धड़ गौतमी नदी के पास आकर गिर गया। अमृत पीने की वजह से स्तुर्भान के दोनों ही भाग जीवित रहे। इंद्र के साथ अन्य देवताओं को उसके जीवित रहने से अत्यंत भय हुआ। भय से मुक्ति की तलाश में वे सभी महादेव के पास पहुंचे। महादेव ने देवताओं को आश्वासन दिया और अपनी दिव्य शक्तियों से देवी चंडिका का प्राकट्य किया। महादेव ने चंडिका को राहु के सर्वनाश का काम सौंपा। चंडिका राहु के मस्तक को लेकर धड़ को ढूंढने के लिए निकली। कथाओं के अनुसार उनका सर विहीन धड़ के साथ भीषण संग्राम हुआ। युद्ध जब किसी निर्णय तक नहीं पहुंचा तो देवता ब्रह्मा जी की शरण में पहुंचे और उनसे राहु के नियंत्रण की याचना की।
असहाय देवों से ब्रह्मा जी ने राहु की स्तुति करने की सलाह दी। देवों की स्तुति के पश्चात राहु ने युद्ध बंद कर दिया। ब्रह्मा जी ने राहु से कहा कि पुत्र अमृत पीने के बाद तुम्हारी मृत्यु नहीं हो सकती इसलिए राक्षसी शरीर का त्याग करक देवगणों में अपना स्थान प्राप्त करो। उन्होंने राहु को विक्षत रूप में जीवित रहने का वरदान भी दिया।
ब्रह्मा जी के कथन के बाद राहु में ज्ञान
गंगा बह उठी और उन्होंने स्वयं अपने शरीर के विनाश का रहस्य चंडिका को बता दिया।
चंडिका ने राहु के धड़ को फाड़ कर अमृत को पूरी तरह से पी लिया। इसके पश्चात ही
राहु के शरीर का नाश सम्भव हो सका। इस घटना के पश्चात देवताओं ने राहु के त्याग से
प्रसन्न होकर उसके सिर और धड़ की छाया ग्रह के रूप नवग्रहों में जगह दी। तभी से
मस्तक राहु और धड़ केतु कहलाने लगा।
राहु के साथ सूर्य और चंद्रमा की शत्रुता ग्रहण के रूप में देखी जा सकती है। राहु केतु को भारतीय ज्योतिष विज्ञान में छाया ग्रह माना जाता है। राहु को दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में लोकपाल की संज्ञा भी दी जाती है। राहु को कई अलग अलग नाम से जाना जाता है। अरबी, उर्दू, फारसी में रास कहते हैं । राहु के कई अन्य नाम भी हैं जैसे- स्वर्भानु, सैंहिकेय, अगु, तम, कपिलास, दीर्घ, असुर विधुन्तुद, अभि, पंक, पात, काकोदर, इन्द्ररिपु, कृष्णांग, गुह, सर्प, आगव , ध्वांत आदि से भी जाना जाता है। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अभ्रपिशाच, भरणीभू और कबन्ध आदि के नाम से भी जाना जाता है।
राहु केतु का वास्तव में भौतिक स्वरूप
में नहीं है बल्कि चन्द्र और पृथ्वी के वलयाकार मार्ग को आपस में कटने से दो काट
बिन्दु ही राहु और केतु या फिर पात कहलाते हैं। इनका दर्शन सूर्य और चन्द्रमा के
ग्रहण के दौरन बिम्ब के रूप में कालिमा स्वरूप दिखता है। वास्तव में राहु और केतु
को तम एवं ग्रहण में उनके स्वरूप को राहु दर्शन कहा जाता है।
राहु केतु सिंह राशि की विशेष स्थिति में उत्पन्न हुई चंद्रमा और पृथ्वी की छाया की अकृति हैं। इस घटना पर वर्णित श्लोक में कहा गया है कि-
सिंहिका सुशुवे राहुं ग्रहं
चन्द्रार्कमर्दनम्
अर्थात् अतंरिक्ष में सिंह राशि की
होने की वजह से चंद्रमा पर राहु ग्रह का झुकाव रहता है।
छाया ग्रह होने की वजह से राहु कुंडली
में जिस ग्रह के साथ बैठ जाएं उसकी के प्रभाव को घटाते बढ़ाते हैं। मनुष्य का
अस्तित्व पंचमहाभूत से जुड़ा हुआ है। राहु भी व्यक्ति और व्यक्तित्व का हिस्सा है।
आत्मा के साथ मन पर छाया का प्रभाव पड़ना ही राहु है। राहु मन के भीतर संशय, भ्रम
और व्यथा की स्थिति को पैदा कर देता है।
जब किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु अपनी चाल चल रहा हो तो उसका रामबाण उपाय यही है कि वह अपने निर्णयों के दौरान धैर्य बरतें, उपकार के कार्य जरूर करे, निस्वार्थ भाव से सेवा कार्य करे, माता-पिता का ख्याल रखने के साथ ईष्ट देव की मन से भक्ति करें। इन कार्यों के करने से राहु के कुप्रभाव नष्ट होते हैं।


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